शनिवार, 2 नवंबर 2013

दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाये.

सबसे पहले तो आप सभी लोगो को दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाये देना चाहूँगा , सबसे पहले इस लिए क्यों की कहते है ना की नीम की पाती गुड़ के साथ बहुत सरलता से  निगली जाती है।
खैर अपनी बात को कहने के पूर्व थोडा सा इतिहास में जाना चाहूँगा . कहते है की भगवन राम के अयोध्या वापस आने पे वह के नागरिको ने उनका दीपो के प्रकाश के साथ स्वागत किया था , और तब से ये त्यौहार मनाया जा रहा है .  इसके वैज्ञानिक पहलू से भी आप सब का दो चार कराना चाहूँगा , जैसा की सभी जानते है की वर्षा ऋतु में वातावरण में कई कीट पतंगे अपनी संख्या की भरी वृधि कर देते है और कई जीव जैसे मकड़ी , गुजुआ ( काला सा कीड़ा , अब मुझे तो यही नाम पता है ),और भी बहुत से कीड़े अपनी अधिकाधिक उपस्थिति दर्ज कराने लगते है . अब हमारे पूर्वजो को शुक्रिया करना चाहूँगा जो बड़े माइंडेड थे , उन्होंने त्यौहार में ही विज्ञानं को फिट कर दिया , घर की साफ़ सफाई को नियम सा कर दिया , और मिटटी के दियो में सरसों के तेल से दीप जलने का प्रचलन  शुरू  किया ,  होता ये था की दिए की लौ से कई कीड़े आकर्षित होते थे और लौ के कारण वही ख़त्म हो जाते थे , और सरसों के तेल का धुआ वातावरण को शुद्ध करता था . अब आते है हमारे आज में हमने अपने पूर्वजो के दीमाग में अपना दीमाग लगाया और ले आये बिजली के बल्ब , कहे पडोसी अगर एक झालर लगाये तो हम लगायेंगे चार . अब ज़माने ने दीप को आउटडेटिड कर दिया ,और हमारे पूर्वजो की शांत आत्मा हमें भूत सी लगाने लगी . खैर झालर जली , रोशनी तो हुई ,तो  नए ज्ञान ने पुराने विज्ञानं को साइड में कर दिया .. जहा देखो झालर रंग बिरंगी ,  दीप बेचारा बस रस्म अदायगी का प्रतीक अपने अस्तित्व को खोजता हुआ ,वो तो गनीमत थी की अभी भगवन बचे थे , उनको भी थोडा डर हुआ होगा की कही हमारी आरती दीपक की जगह बल्ब से न होने लगे .खैर झालर मुस्कुरा रही थी और दीप सोच रहा था की मनुष्य को दिमागी प्राणी कहा जाता है पैर आज इनकी अक्ल क्या घास खाने गयी है . खैर अब  एक उम्मीद बंधी है , शुक्रिया कहना चाहूँगा अपने गुरुवर का और उनके जैसे कई लोगो का जो फिर से प्राचीन विज्ञानं को स्थापित करने में जुटे है ... और इसी आशा के साथ की आप सभी दीप को झालर से ज्यादा उपयोग करेंगे।
  कहना चाहूँगा    .



                         उम्मीदों की रोशनी कभी बुझने न देना .
                         सूखे हुए पेड़ो पर भी बहारे आती है .

                                                                                                    "अमन मिश्र "

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

निशाँ

किनारों की जरुरत नहीं है मुझको ,
  लहरों से हमको  वफ़ा  चाहिये।
ख़ुशी की तो कोई तमन्ना नहीं अब,
ग़मों में  ही हमको मजा चाहिए।

मिलेगा कोई इस गैरे  महफ़िल में ,
इसकी तो कोई आरजू ही नहीं,
था कोई अपना कभी साथ अपने ,
हमें तो उसके निशाँ चाहिए।

किनारों की जरुरत नहीं है मुझको ,
  लहरों से हमको  वफ़ा  चाहिये।
                                                                    
"aman mishra"

मंगलवार, 3 सितंबर 2013

कुछ तो जगह बनाई होगी

कुछ तो जगह बनाई होगी ,
रूठना  तेरा ,वो मेरा मनाना।
कभी तो इसकी  भी याद आई होगी।

 कुछ तो जगह बनाई होगी......
  साथ चलना वो हसना हसाना ,
मिलती जो नजरे ,
नजरे झुकाना।
 कभी तो आके सपनो में तेरे  ,
तुझको आवाज लगाईं होगी ,
कुछ तो जगह बनाई होगी।

जो देखती होगी तुम,
 आस्मां को नज़रे  उठा के रातो में
उस अधूरे चाँद ने,
 मेरी भी बात बताई होगी ….
 कुछ तो जगह बनाई होगी.....

 कभी तो इसकी  भी याद आई होगी।
 कुछ तो जगह बनाई होगी.....       " 


शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

बापू आखिर ये देश है तुम्हारा ..

बापू जो तुम देख लेते इस देश का हाल ,
शायद रो पड़ते .
चल देते अपनी लाठी के सहारे ,
कही एकांत में.

जहा न हो इस देश की ऐसी दुर्दशा .
लेकर जो सपना आँखों में निकले थे दांडी की तरफ ,
देखते उन्हें टूटते हुए.

देखते अपने ही लोगो को गैरों की तरह रहते हुए.
बढ़ाते हुए विषमता के पेड़ को ,
जिसे तुम चाहते थे सुखाना .

बापू इस देश में अब तुम फिर से न आना .

पर हमें पता है तुम फिर से आओगे ही ,
 बन चुके इतिहास को दोहराओगे ही .

फिर से उखाड़ फेखोगे इन समाज की रुढियो को,
 फिर से करोगे कुछ ऐसा की हमें मिलेगी
एक नयी आशा ...
मुझे पाता है तुम फिर आओगे ,

आखिर ये देश है तुम्हारा ..
 आखिर ये देश है तुम्हारा ..  "aman mishra"

बुधवार, 7 अगस्त 2013

वो भी कहीं सिसकती होगी .

तड़पता है  मेरा दिल उसके खातिर ,
वो भी कहीं  सिसकती  होगी .

सिमटता  हूँ मै जैसे वो मेरी बाँहों में हो  ,
वो भी यू   ही सिमटती  होगी।

छू  कर  आती है हवा जैसे  उसको ,
मेरी सांसो  में आने से पहले।।
वो  भी अहसास से  इस,
 यु  ही गुजरती होगी।

देखता  हु उसको मै जब भी बंद होती है मेरी आँखें ,
वो भी मेरे अक्श  को यु ही तरसती होगी।

      "aman mishra"
वो भी कहीं  सिसकती  होगी .

मंगलवार, 16 जुलाई 2013

गंग प्रेम

इस  गंग प्रेम की प्रखर धार में ,
बह जाता ये चेतन मन ...

होती है पीड़ा कष्ट बहुत ,
पर  मिलता है अदभुत आनंद ..

प्रेम के कारन जग है जीवित ,
प्राण भरे ये है अमृत ..

ये  गूड रहस्यों की  है माला ,
मन के सागर  की उदंड तरंग ...

प्रेम नहीं कोई कोमल पथ ,
 है तप से सिंचित एक उपवन ..
नहीं यहाँ  स्थान   कटुता का ,
भावो का होता  वंदन   ..

करुणा है आधार प्रेम का ,
त्याग है इसके कण कण में ..
मानव भी बन जाये ,देवो के तुल्य
बस जाये जो ये मन में ....

इस  गंग प्रेम की प्रखर धार में ,
बह जाता ये चेतन मन ...

                 जारी  ...
                                         "" aman  mishra  "'
                               


रविवार, 9 जून 2013

ये कैसा भारत निर्माण ...


मूल्यों के गिरते स्तर पर ,
ये कैसा भारत निर्माण ...

नैतिकता के शव पे खड़ा ,
आज का बदलता हिंदुस्तान ....

ये कैसा भारत निर्माण ...

कौन सी माता ,
किसके बच्चे...
सब झूठे है ,फिर भी सच्चे ..

चौराहों  पे बिकता आदर्श ,
 झूठे छेड़ते सत्य  की तान ...

घोटालो की खुली मंडी,
लज्जा भी हो रही हैरान .....

ये कैसा भारत निर्माण ....
.ये कैसा भारत निर्माण .....

गंगा है मैली ,मैला
यमुना का आँचल ..
ये  सुनहरा है आज ,
तो  क्या होगा अपना  कल ?

खड़ा किसान रो रहा ,
बाकि नहीं देह में जान ..
ये कैसी विकास की कीमत ,
खो रहे है  अपना मान..

बस हो रहा भारत निर्माण ...
ये कैसा  भारत निर्माण ....

रातों रात पेड़ काट दिए, जंगल जला दिए। हम सोए रहे, नदिया सूखा दिए। वो चिड़िया अब रोती है, घोसले गवा दिए, कुछ आंखो में पानी लाओ, जो बोतल...