यु बैठा तनहा ,स्याह पन्नो को पलटता ..
जिंदगी के कुछ लम्हों को फिर से पाने को,
आज मै बेक़रार हू ..
बंद आँखों से ,
लहराते सागर ,घुमड़ते आसमान को देखता ,
कल्पना में तेरे साथ को पाता,
खुद में ही खोता , लहरों में झूलता ..
में उन सपनो को फिर से जीने को बेक़रार हू ..
पर फिर याद आता है ,
इस समाज का चेहरा ,
हसता मुस्कुराता ,
जहर से भरा ,
बस पीछे हट जाते है मेरे कदम ,
अरमानो को बांध लेता हू खुद के भीतर ही ,
खुद के लिए नहीं ,बस तेरे खातिर ,
समझौते करता ,एक झूठी हसी लिए ,
खुद के सपनो को खुद ही तोड़ता ,
सूखे पेड़ सा गिरने का इंतजार करता .
की कब आएगी कोई हवा ले जाएगी तुझे मुझसे दूर ,
कुछ न कह पाउँगा मै ,
मुट्टी भी बंद होगी ,
पर हाथ तो बंधे होगे ,
बस तेरे खातिर ,तेरी मुस्कराहट को ,
कट जाऊंगा एक पेड़ सा ,
बिना किसी चीख के ,बिना किसी रुदन के .
बस तेरे खातिर ..बस तेरे खातिर ..
आह यही जिंदगी है, यही प्यार है ......................
"अमन मिश्र"
सराहनीय प्रयास .आभार . हम हिंदी चिट्ठाकार हैं.
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